तेरे ग़म से नजात मिल जाए
और तुझ को हयात मिल जाए
आज कल बदले बदले तेवर हैं
काश तुम से ही मात मिल जाए
साफ़ इनकार करना बनता है
चाहे नहर-ए-फ़ुरात मिल जाए
लौट कर एक दिन तू आएगा
है दुआ तेरा साथ मिल जाए
बैठ कर बात कर रहे थे हम
काश वैसी ही रात मिल जाए
तू अगर मिल नहीं सका हमदम
क्या मज़ा काइनात मिल जाए
— Afzal Sultanpuri















