डूबा हुआ है वो इसी वहम-ओ-गुमान में
रहता नहीं है कोई भी अब आसमान में
जब से सफ़र की राह में तक़्सीम क्या हुआ
वीरानियाँ सी छा गईं उस के मकान में
शामिल नहीं था जो कभी दर्स-ए-निसाब में
इक रोज़ वो भी आया मेरे इम्तिहान में
मैं इस लिए भी पास से उठकर के आ गया
नफ़रत भरी हुई थी बस उस की ज़बान में
— Ansar Eatvi















