'इश्क़ के बुझते चराग़ों से गुज़ारा होगा
ऐसे हालात में अब कौन हमारा होगा
चाहे हो जैसे भी तन्हा ही गुज़ारा होगा
अब कहाँ 'इश्क़ तेरे बाद दुबारा होगा
डूबने वाले ने बस पाँव न मारे होंगे
पाँव के साथ में हर हाथ भी मारा होगा
इन रक़ीबों की तरफ़ जो वो खिंचे जाते हैं
ऐसा लगता है उन्हें 'इश्क़ दुबारा होगा
वो मुझे छोड़ गया है तो शिकायत कैसी
अब किसी और मुक़द्दर को सँवारा होगा
नाव डूबी है तो मल्लाह की साज़िश न कहो
नाव ने सर पे लदा बोझ उतारा होगा
चाँद का दोष नहीं है जो हुई रात तवील
उसने लगता है ख़म-ए-ज़ुल्फ़ सँवारा होगा
टूट जाएगी किसी रोज़ ये साँसों की डोर
हाँ किसी रोज़ ज़माने से किनारा होगा
बाद मेरे मेरे अशआर पे देंगे वो दाद
हाए उस वक़्त बहुत शोख़ नज़ारा होगा
ऐसी तन्हाई में इक रोज़ मैं खो जाऊँगा
चाँद होगा न कोई पास सितारा होगा
मुद्दतें बीत गईं दोस्त चलो घर 'साहिल'
गाँव की धूल ने हम को भी पुकारा होगा
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