जिस ख़ाक से बने है उसी ख़ाक ही से ''इश्क़
हम सरफिरे हैं करते नहीं ज़िंदगी से ''इश्क़
कुछ भी नहीं सिवाए तबाही के 'इश्क़ में
हम चाहते हैं हो न किसी को किसी से ''इश्क़
जिसने तमाम शहर को बर्बाद कर दिया
अब आप भी लड़ाने लगे हैं उसी से ''इश्क़
सच सच बताएँ आप को अल्लाह की क़सम
करते हैं हम कि आप भला उस मुई से ''इश्क़
क़िस्सा ये देखना है कहाँ जा के हो तमाम
ज़ख़्मों को मेरे होने लगा है छुरी से ''इश्क़
उतना निखार आएगा फ़न्न-ए-सुख़न में दोस्त
जितना करेंगे आप फ़न-ए-शाइरी से ''इश्क़
'साहिल' वो शख़्स बुलहवस-ए-हुस्न है तो फिर
उस को कहाँ से होगा बताओ किसी से 'इश्क़
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