रंग लाती है ग़ज़ल में नए हर बार रदीफ़
ढूँढता फिरता हूँ हर-सू मैं नई चार रदीफ़
यूँँ सितम सहते रहेंगे जो ये अशआर मेरे
आप हो जाएगी ख़ुद देखना तलवार रदीफ़
इस तरह बाँधी है इस दौर में कुछ लोगों ने
बारहा बँधते हुए हो गई आज़ार रदीफ़
ज़ेहन में रोज़ उभरते हैं हज़ारों मज़मून
माँगते रहते हैं हर रोज़ ही अशआर रदीफ़
एक तो शे'र मेरे होते हैं हल्के फुल्के
और फिर उस पे सितम ढाती है बीमार रदीफ़
दूसरों की न करें आप ज़मीं इस्तेमाल
खोज के लाया करें कोई तो दमदार रदीफ़
जाने क्या बात है बँधती ही नहीं है 'साहिल'
करने लगती है क़वाफ़ी से ही तक़रार रदीफ़
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