दिल मेरा रूठ चुका है ये मुहब्बत के बग़ैर
जिस्म कमज़ोर हुआ मेरा बग़ावत के बग़ैर
चोट लाज़िम है मुहब्बत में ज़माने वालों
इक ग़ज़ल भी न मुकम्मल है अज़ीयत के बग़ैर
उसकी ज़ुल्फ़ों से पता चलती है ख़ूबी उसकी
लिख रहा हूँ मैं ग़ज़ल उसकी ज़ियारत के बग़ैर
गुफ़्तगू होगी अगर रात में जान-ए-जानाँ
सो नहीं सकता हूँ मैं तेरी इजाज़त के बग़ैर
'इश्क़ का कैसा नशा चढ़ गया 'दानिश' तुझ पर
उसकी ता'रीफ़ तू करता है हक़ीक़त के बग़ैर
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