Meaning of

उम्र-ए-ख़िज़्र

umr-e-khizr • خیرو

ख़िज़्र की उम्र; अमर जीवन

life of Khizr; eternal life

خضر کی عمر; ابدی زندگی

Arabic

छोड़ जाओ मुझे आइना देख लो
ख़ूब-सूरत नहीं एक ग़द्दार हो

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हम ऐसा कहने वाले जब तलक है
ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी

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हाँ मैं तो लिए फिरता हूँ इक सजदा-ए-बेताब
उन से भी तो पूछो वो ख़ुदा हैं कि नहीं हैं

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ये दाढ़ियाँ ये तिलकधारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं

क़बीले वालों के दिल जोड़िए मेरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं

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बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के
आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को

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यूँंँ हक़ जताते मैं ग़ज़ल हूँ वो तख़ल्लुस है कोई
बहरों में करते क़ैद मिसरे रब्त में होते नहीं

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अना पर बात आए लहरों को भी मोड़ दूँगा
कटे गर्दन भले तेरी अकड़ मैं तोड़ दूँगा

रहूँगा शान से चाहे खड़ी हो मौत सम्मुख
झुकाऊँगा न सर अपना ये साँसें छोड़ दूँगा

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सिर झुकाऊँगा सब को भरोसा न था
देख कर मैं तुझे ख़ुद-ब-ख़ुद झुक गया

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महल में नहीं गर तो बस्ती में मिलते
हक़ीक़त नहीं तो कहानी में मिलते

ये सर्दी तो तब भारी सर्दी में गिनते
तेरे बाल जब मेरी जर्सी में मिलते

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जिस ने गंगा में वुज़ू कर के नमाज़े हैं पढ़ी
वो कभी मुल्क के ग़द्दार नहीं हो सकते

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छोड़ जाओ मुझे आइना देख लो
ख़ूब-सूरत नहीं एक ग़द्दार हो

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हम ऐसा कहने वाले जब तलक है
ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी

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कविता की गहराइयों में, 'उम्र-ए-ख़िज़्र' उस कालातीतता और ज्ञान का आभास कराता है जो ख़िज़्र से जुड़ा है, जो अपनी अमरता और मार्गदर्शन के लिए जाने जाते हैं। कविता ने इस शब्द को अमरता और शाश्वत ज्ञान की खोज के विषयों को तलाशने के लिए अपनाया है।

'उम्र-ए-ख़िज़्र' का उपयोग कवि अक्सर अमर जीवन की इच्छा को दर्शाने के लिए करते हैं। यह मानव अस्तित्व की क्षणभंगुरता के विपरीत प्रयोग होता है। यह शब्द उस ज्ञान का प्रतीक भी हो सकता है जो समय से परे है।

कविता में, 'उम्र-ए-ख़िज़्र' ज्ञान की शाश्वत खोज और अमरता के लिए मानव की लालसा का प्रतीक बन जाता है।