Meaning of

ज़ौ

zau • ذو

प्रकाश; चमक; दीप्ति

light; radiance; brilliance

روشنی; چمک; تابانی

Arabic

एक ‘ज़ौन’ का नशा जो उतरता ही नहीं
ऊपर से तेरी याद ज़ेहन से नहीं जाती

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इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है
हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए

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हसीन इतनी है तू ज़ौक़-ए-नज़र तो बन गया हूँ मैं
मगर दिल की कियारी में नया कुछ बो नहीं सकता

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ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं
ऐ ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या कीजे हम सूरत-ए-जानाँ भूल गए

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सफ़र के बा'द भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए
ख़याल ओ ख़्वाब में अब के भी घर न रह जाए

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अब कोई मुझ सेे ग़ज़ल होगी नहीं
जौक़, दानाई, क़लम, सब कुछ ख़तम

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ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

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हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा
हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं

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कागज़ों की कश्ती पर दिल के ज़ख़्म ढोते हैं
हाथ लगती चीज़ों को हाथ लगते खोते हैं

एक दिन अँधेरे ने आके मुझ सेे बोला ये
जो उदास रहते नइँ वो उदास होते हैं

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मीर, ग़ालिब, ज़ौक़, मोमिन, दाग़ पढ़ कर थक गए
काश के तुम बैठ कर ख़ुद को भी पढ़ लेते कभी

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एक ‘ज़ौन’ का नशा जो उतरता ही नहीं
ऊपर से तेरी याद ज़ेहन से नहीं जाती

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इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है
हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए

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ज़ौ प्रकाश की उस शुद्धतम अवस्था को दर्शाता है, एक ऐसी चमक जो साधारण से परे है। कविता में यह प्रायः ज्ञान, स्पष्टता और दिव्य उपस्थिति का प्रतीक होता है, जो अज्ञान के अंधेरों को दूर करता है।

कवि ज़ौ का उपयोग सुबह की पहली किरण, भोर के प्रकाश, या ज्ञान के आंतरिक प्रकाश को चित्रित करने के लिए करते हैं। यह अंधकार के विपरीत होता है, चाहे वह वास्तविक हो या रूपक, और अक्सर आशा और नवीनीकरण के लिए एक रूपक के रूप में कार्य करता है।

ज़ौ काव्यात्मक परिदृश्य में एक प्रकाशस्तंभ है, जो पाठकों को प्रकाश और समझ की ओर ले जाता है।