Meaning of

दोज़ख़

dozakh • خوف

नरक; यातना; कष्ट

hell; torment; suffering

دوزخ; عذاب; تکلیف

Persian

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़ डरते हैं ऐ ज़मीन तेरे आदमी से हम — Unknown
इस ख़ौफ़ में कि ख़ुद न भटक जाएँ राह में भटके हुओं को राह दिखाता नहीं कोई — Anwar Taban
परिंद क्यूँँ मिरी शाख़ों से ख़ौफ़ खाते हैं कि इक दरख़्त हूँ और साया-दार मैं भी हूँ — Asad Badayuni
यहाँ मौत का ख़ौफ़ कुछ यूँँ है सब को कि जीने की ख़ातिर मरे जा रहे हैं — Sapna Moolchandani
हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें — Waseem Barelvi
दुश्मनों की जफ़ा का ख़ौफ़ नहीं दोस्तों की वफ़ा से डरते हैं — Hafeez Banarasi
भले हैं फ़ासले क़ुर्बत से ख़ौफ़ लगता है ये क्या बला है जो ऐसी विरानी क़ैद हुई — Beybaar

दोज़ख़ एक नर्कीय क्षेत्र की छवि उत्पन्न करता है, एक ऐसा स्थान जहाँ अनंत पीड़ा और निराशा होती है। कविता में, यह अक्सर जीवन में अनुभव किए गए आंतरिक उथल-पुथल और भावनात्मक नर्क का प्रतीक होता है, जो मानव अस्तित्व के गहरे रंगों को दर्शाता है।

कवि 'दोज़ख़' का उपयोग अस्तित्वगत भय और भावनात्मक पीड़ा के विषयों की खोज के लिए करते हैं। यह उन व्यक्तिगत नर्कों का प्रतिनिधित्व कर सकता है जिन्हें हम बनाते हैं या सहते हैं, जो स्वर्ग या शांति की धारणाओं के विपरीत है।

दोज़ख़ आंतरिक संघर्षों के लिए एक शक्तिशाली रूपक के रूप में कार्य करता है, जो हमें प्रकाश के साथ आने वाली छायाओं की याद दिलाता है।