Meaning of

सोज

Soj • سوز

जलन; जुनून; उत्साह

burning; passion; fervor

جلن; جنون; جوش

Persian

'देव' अब और ये ग़ज़लें नहीं होंगी हम से
सोज़-ए-ग़म है लिखा ऐसा जो मिटाए न बने

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दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है

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हमीं हैं सोज़ हमीं साज़ हैं हमीं नग़्मा
ज़रा सँभल के सर-ए-बज़्म छेड़ना हम को

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मुझ को ख़्वाहिश है उसी शान की दिवाली की
लक्ष्मी देश में उल्फ़त की शब-ओ-रोज़ रहे

देश को प्यार से मेहनत से सँवारें मिल कर
अहल-ए-भारत के दिलों में ये 'कँवल' सोज़ रहे

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दिल-ए-सोज़ाँ को भी महका रहे हैं
हमें जो ख़्वाब तेरे आ रहे हैं

तेरे शैदाई पागल हो चुके हैं
तिरी तस्वीर चू
में जा रहे हैं

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जानता हूँ तुझे साहिल में हवा छेड़ेगी
बाल मत खोलना सैल-ए-बला ला सकती हो

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सोज़-ए-वफ़ा के नाम से अरमान थे बहुत
लेकिन दयार -ए-इश्क़ से अंजान थे बहुत

लगता था उन्हें इश्क़ की राहें हैं मुनाकिद
आ कर के राह-ए-इश्क़ में हैरान थे बहुत

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कभी तन्हाई-ए-कोह-ओ-दमन इश्क़
कभी सोज़-ओ-सुरूर-ओ-अंजुमन इश्क़

कभी सरमाया-ए-मेहराब-ओ-मिंबर
कभी मौला अली ख़ैबर शिकन इश्क़

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'देव' अब और ये ग़ज़लें नहीं होंगी हम से
सोज़-ए-ग़म है लिखा ऐसा जो मिटाए न बने

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दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है

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अपने मूल अर्थ में, 'सोज़' एक गहरी, जलती हुई भावना को व्यक्त करता है, जो अक्सर तीव्र भावना या जुनून से जुड़ी होती है। कविता में, यह शब्द उत्साह और लालसा का सार पकड़ता है, एक दिल की छवि को चित्रित करता है जो इच्छा से भस्म हो गया है।

'सोज़' का उपयोग कवि अक्सर प्रेम की तीव्रता या वियोग के दर्द को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह एक ऐसा शब्द है जो प्रेमी के आंतरिक उथल-पुथल, उस जलती हुई इच्छा को जीवंत करता है जो बुझने से इंकार करती है।

कविता के क्षेत्र में, 'सोज़' अधूरी इच्छाओं का एक प्रकाशस्तंभ है, दिल की अपनी भावनाओं की निरंतर खोज का प्रमाण है।