Meaning of

दशहत

dashhat • دہشت

आतंक; भय

terror; fear

دہشت; خوف

Arabic

चार सू आह-ओ-फ़ुग़ाँ है दर्द है
मुश्किलों में मुब्तिला हर फ़र्द है

वक़्त के हाकिम की नज़रों में शजर
जो भी हक़ माँगे वो दहशत-गर्द है

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सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था
माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था

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दहशत-गर्दी फैल रही है अब मज़हब के नारों से
लोगों को मारा जाता है गोली से हथियारों से

कौन है रहबर कौन है रहज़न सब को ख़बर है 'दानिश' अब
क़ातिल को ताक़त मिलती है सत्ता के गलियारों से

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आरज़ू' जाम लो झिजक कैसी
पी लो और दहशत-ए-गुनाह गई

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ख़ुदा जाने वो ऐसे कैसे क्यूँ ये मर्द पाले हैं
सियासी लोग अपने दल में दहशतगर्द पाले हैं

किया करते हैं जो ज़ुल्म-ओ-सितम हर बेबसों पर यूँँ
वो अपने आस्तीनों में फ़क़त बे-दर्द पाले हैं

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मुझ में सात समुंदर शोर मचाते हैं
एक ख़याल ने दहशत फैला रक्खी है

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दिलों में बसे जिन के दहशत मुसलसल
ख़मोशी है उन की जहालत मुसलसल

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दर्स मुहब्बत का हम ही देते फिरते हैं
और हमीं को दुनिया दहस्तगर कहती है

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दिल डरा ही देने वाले जैसे दहशत के मनाज़िर
देखता हूँ मैं ये कैसे कैसे क़ुदरत के मनाज़िर

कर नहीं सकती मुतासिर तुझ को मेरी शा'इरी ये
तू ने देखे ही नहीं हैं एक ख़ल्वत के मनाज़िर

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रौशन आग़ाज़-ए-इश्क़ है ये इक तरफ़ा चाहत होगी ही
महबूब अगर अच्छा है तो खोने की दहशत होगी ही

इस बे-ग़ैरत दुनिया में इक मुफ़्लिस उम्मीद लगा बैठा
हो देर भले साहिब लेकिन अल्लाह की रहमत होगी ही

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चार सू आह-ओ-फ़ुग़ाँ है दर्द है
मुश्किलों में मुब्तिला हर फ़र्द है

वक़्त के हाकिम की नज़रों में शजर
जो भी हक़ माँगे वो दहशत-गर्द है

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सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था
माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था

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दशहत एक गहरे भय की भावना को जागृत करता है, जो अक्सर अज्ञात या अत्यधिक से जुड़ा होता है। कविता में, यह आंतरिक और बाहरी संघर्षों के लिए एक रूपक बन जाता है, उस डर की भावना को पकड़ता है जो पंगु बना सकता है या उकसा सकता है।

कवि 'दशहत' का उपयोग मनोविज्ञान के अंधेरे कोनों में उतरने के लिए करते हैं, अस्तित्व के डर और मन की छायाओं के विषयों का पता लगाते हैं। यह साहस के विपरीत है, भय को दूर करने के संघर्ष को उजागर करता है।

'दशहत' उन भय का दर्पण है जो हमें सताते हैं, उन छायाओं की एक काव्यात्मक खोज है जिनका हमें सामना करना चाहिए।