Meaning of

ख़ूगर-ए-ज़ब्त

khoogar-e-zabt • خیرو

आदतन संयम; आत्म-नियंत्रण

habitual restraint; self-control

عادتاً ضبط; خود پر قابو

Persian

छोड़ जाओ मुझे आइना देख लो
ख़ूब-सूरत नहीं एक ग़द्दार हो

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हम ऐसा कहने वाले जब तलक है
ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी

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हाँ मैं तो लिए फिरता हूँ इक सजदा-ए-बेताब
उन से भी तो पूछो वो ख़ुदा हैं कि नहीं हैं

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ये दाढ़ियाँ ये तिलकधारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं

क़बीले वालों के दिल जोड़िए मेरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं

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बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के
आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को

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यूँंँ हक़ जताते मैं ग़ज़ल हूँ वो तख़ल्लुस है कोई
बहरों में करते क़ैद मिसरे रब्त में होते नहीं

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अना पर बात आए लहरों को भी मोड़ दूँगा
कटे गर्दन भले तेरी अकड़ मैं तोड़ दूँगा

रहूँगा शान से चाहे खड़ी हो मौत सम्मुख
झुकाऊँगा न सर अपना ये साँसें छोड़ दूँगा

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सिर झुकाऊँगा सब को भरोसा न था
देख कर मैं तुझे ख़ुद-ब-ख़ुद झुक गया

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महल में नहीं गर तो बस्ती में मिलते
हक़ीक़त नहीं तो कहानी में मिलते

ये सर्दी तो तब भारी सर्दी में गिनते
तेरे बाल जब मेरी जर्सी में मिलते

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जिस ने गंगा में वुज़ू कर के नमाज़े हैं पढ़ी
वो कभी मुल्क के ग़द्दार नहीं हो सकते

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छोड़ जाओ मुझे आइना देख लो
ख़ूब-सूरत नहीं एक ग़द्दार हो

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हम ऐसा कहने वाले जब तलक है
ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी

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'ख़ूगर-ए-ज़ब्त' शब्द अनुशासित आत्म-संयम की भावना को जागृत करता है। मूल रूप में, यह उन लोगों को संदर्भित करता है जिन्होंने अपनी भावनाओं और इच्छाओं को नियंत्रित करने की कला में महारत हासिल की है। कविता ने इस विचार को विस्तार दिया है, जिसमें उथल-पुथल के समय में संयम बनाए रखने के लिए आवश्यक आंतरिक शक्ति की खोज की गई है।

कवि अक्सर 'ख़ूगर-ए-ज़ब्त' का उपयोग उन पात्रों को चित्रित करने के लिए करते हैं जो अराजकता के बीच शांत रहते हैं। यह उन शब्दों के विपरीत है जो आवेगशीलता या भावनात्मक विस्फोट का सुझाव देते हैं। यह आंतरिक शक्ति और लचीलापन का प्रमाण है।

कविता में, 'ख़ूगर-ए-ज़ब्त' शांत शक्ति का प्रतीक बन जाता है। यह एक ऐसे संसार में संयम की सुंदरता को दर्शाता है जो अक्सर अराजकता से प्रेरित होता है।