Meaning of

ख़ुम

khum • خم

मदिरा पात्र; प्याला

wine jar; goblet

شراب کا برتن; پیالہ

Persian

तुम बड़े अच्छे वक़्त पर आए
आज इक ज़ख़्म की ज़रूरत थी

78

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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे
तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी

डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे
और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी

332

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तेरे लगाए हुए ज़ख़्म क्यूँँ नहीं भरते
मेरे लगाए हुए पेड़ सूख जाते हैं

202

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जो दुनिया को सुनाई दे उसे कहते हैं ख़ामोशी
जो आँखों में दिखाई दे उसे तूफ़ान कहते हैं

132

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एक नज़र देखते तो जाओ मुझे
कब कहा है गले लगाओ मुझे

तुम को नुस्ख़ा भी लिख के दे दूँगा
ज़ख़्म तो ठीक से दिखाओ मुझे

95

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मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में

93

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न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहीं
तिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहीं

तुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँ
तिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं

86

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दिल के दरवाज़े भेड़ कर देखो
जख़्म सारे उधेड़ कर देखो

बंद कमरे में आईने से कभी
तुम मेरा जिक्र छेड़ कर देखो

85

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लोग काँटों से बच के चलते हैं
मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं

80

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किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा

79

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तुम बड़े अच्छे वक़्त पर आए
आज इक ज़ख़्म की ज़रूरत थी

78

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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे
तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी

डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे
और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी

332

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'ख़ुम' सभाओं की छवियों और साझा क्षणों की गर्माहट को दर्शाता है। कविता में, यह जीवन के नशे, आनंद और दुःख के पात्र, और स्वतंत्र रूप से बहने वाली भावनाओं के मिश्रण का प्रतीक है।

कवि 'ख़ुम' का उपयोग जीवन के अनुभवों की समृद्धि को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह भोग और चिंतन का प्रतीक है, उत्सवों और विचारों का मौन साक्षी। यह खालीपन के विपरीत है, जीवन की पूर्णता को उजागर करता है।

'ख़ुम' जीवन के नशे का पात्र है, साझा क्षणों में पाई जाने वाली समृद्धि की याद दिलाता है।