Meaning of

रश्के

rashke • رشک

ईर्ष्या; जलन

envy; jealousy

حسد; رشک

Arabic

फ़र्त-ए-ख़ुशी से अपनी जो भी रश्क करते हैं
उन को तिरी बनाई वो जन्नत तलब नहीं

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धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह का
चंदा वसूल होता है साहब दबाव से

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मेरे रश्क-ए-क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया
बर्क़ सी गिर गई काम ही कर गई आग ऐसी लगाई मज़ा आ गया

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शायद आ जाए कभी देखने वो रश्क-ए-मसीह
मैं किसी और से इस वास्ते अच्छा न हुआ

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उस चाँद को भी रश्क होता था उसी को देख कर
मैं भी खुले आकाश में तस्वीर उस की चूमता

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रश्क़ अपने ही सुख़न से क्यूँ नहीं होगा मुझे
वो मुहब्बत मुझ सेे नइँ मेरे सुख़न से कर रही

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रश्क़ होता है चूमते हैं गाल
तेरे झुमके रक़ीब हैं मेरे

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तुम्हारे कान के झुमके से मुझ को रश्क़ ऐसे है
कभी गर्दन को छूता है कभी गालों को चू
में है

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है मुझ को रश्क़ तेरी पाँव की पायल से इतना यूँँ
लिपट कर पाँव से तेरे ये इतना नाचती क्यूँँ है

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अब अकेला घर ही मुझ को प्यार करता है
कोई आए रश्क में तकरार करता है

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फ़र्त-ए-ख़ुशी से अपनी जो भी रश्क करते हैं
उन को तिरी बनाई वो जन्नत तलब नहीं

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धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह का
चंदा वसूल होता है साहब दबाव से

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रश्के एक जटिल भावना है, जिसमें ईर्ष्या के साथ-साथ प्रशंसा भी होती है। कविता में, यह केवल जलन नहीं है, बल्कि किसी और के पास जो है, उसकी चाहत को दर्शाता है, चाहे वह सुंदरता हो, प्रतिभा हो, या प्रेम।

कवियों द्वारा रश्के का उपयोग अक्सर प्रशंसा और ईर्ष्या के बीच के तनाव को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। यह अप्राप्त प्रेम की मिठास और कड़वाहट या किसी और की खुशी के लिए मौन चाहत को उजागर कर सकता है।

रश्के मानव भावनाओं की द्वैतता का प्रतिबिंब है। यह हमें प्रशंसा और ईर्ष्या के बीच की महीन रेखा की याद दिलाता है।