Meaning of

शब-ए-हिज्र

shab-e-hijr • شب ہجر

विरह की रात; तड़प की रात

night of separation; night of longing

جدائی کی رات; تڑپ کی رات

Persian

कुछ तो मुश्ताक़ शब-ए-हिज्र में राहत होगी
जाते-जाते कोई तस्वीर पुरानी दे दे

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गुजर चुकी जुल्मते शब-ए-हिज्र, पर बदन में वो तीरगी है
मैं जल मरुंगा मगर चिरागों के लो को मध्यम नहीं करूँगा

ये अहद ले कर ही तुझ को सौंपी थी मैं ने कलबौ नजर की सरहद
जो तेरे हाथों से क़त्ल होगा मैं उस का मातम नहीं करूँगा

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ये सानिहा भी शब-ए-हिज्र आ पड़ा हम पर
तेरा ख़याल तो आया तेरी तलब न हुई

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एक क़िस्सा वफ़ा का सुना दीजिए
दर्द-ए-दिल को ज़रा अब बढ़ा दीजिए

मेरे अल्ला कब तक शब-ए-हिज्र ये
मुझ को महबूब से फिर मिला दीजिए

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शब-ए-हिज्राँ में सुनता था, सलीब-ए-वक़्त की सिसकी
ये कुछ पागल समझते हैं घड़ी आवाज़ करती है

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ग़म की शब हिज्र-ए-माह मुबारक हो
हम को अब ये तनख़्वाह मुबारक हो

उस ने उस को रक्खा हम सेे पहले
सो शहज़ादी को शाह मुबारक हो

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शब-ए-हिज्र तेरी है क्या शर्त अब जो
मेरी जाँ है अटकी फ़ुग़ाँ बे-असर है

ये आँधी है लाई उसी ने कि 'हैदर'
मेरा पेट ख़ाली भरा उस का घर है

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शब-ए-हिज्रां बुझा बैठी हूँ मैं सारे सितारे पर
कोई फ़ानूस रौशन है ख़मोशी से मेरे अंदर

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ईद से चंद दिनों पहले ही बिछड़े थे हम
यूँँ शब-ए-कद्र शब-ए-हिज्र सी गुज़री मुझ पर

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ये शब-ए-हिज्राँ है तो आप पे वाजिब है शजर
हिज्र-ए-महबूब में गिर्या करो सीना पीटो

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कुछ तो मुश्ताक़ शब-ए-हिज्र में राहत होगी
जाते-जाते कोई तस्वीर पुरानी दे दे

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गुजर चुकी जुल्मते शब-ए-हिज्र, पर बदन में वो तीरगी है
मैं जल मरुंगा मगर चिरागों के लो को मध्यम नहीं करूँगा

ये अहद ले कर ही तुझ को सौंपी थी मैं ने कलबौ नजर की सरहद
जो तेरे हाथों से क़त्ल होगा मैं उस का मातम नहीं करूँगा

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यह शब्द उस गहरी भावनात्मक उथल-पुथल और तड़प को व्यक्त करता है जो प्रिय से दूर बिताई गई रात के दौरान महसूस होती है। कविता में, यह विरह और समय के उस प्रवाह को पकड़ता है जो प्रेम की अनुपस्थिति में अनंत लगता है।

कवि अक्सर इस वाक्यांश का उपयोग विरह और तड़प के विषयों की खोज के लिए करते हैं। यह भावनात्मक दूरी के लिए एक रूपक के रूप में कार्य करता है। रात अनुपस्थिति के दर्द को व्यक्त करने के लिए एक कैनवास बन जाती है।

शब-ए-हिज्र दिल की मौन पुकारों को पकड़ता है। यह प्रेम की अनुपस्थिति की एक शाश्वत अभिव्यक्ति है।