Meaning of

शफ

shaf • شف

भोर; सुबह की रोशनी

dawn; morning light

صبح; صبح کی روشنی

Arabic

तुम जो हँसती हो तो मस्ताना कँवल लगती हो
'मीर' का शे'र हो 'ग़ालिब' की ग़ज़ल लगती हो

संग-ए-मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन
साँस लेता हुआ इक ताजमहल लगती हो

9

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माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है
आज अपने साथ अपना जनम दिन मनाया है

51

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ये शफ़क़ चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते
तुम नहीं हो तो नज़ारे नहीं अच्छे लगते

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जिन्हें सब लोग गूँगा बोलते हैं
मेरे आगे वो ऊँचा बोलते हैं

ख़मोशी बोलने वालों की सफ़ में
हमीं सब सेे ज़ियादा बोलते हैं

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कभी बिस्मिल से पूछो तुम कभी अशफ़ाक़ से पूछो
वतन क्या चीज़ है यारों भगत आज़ादस पूछो

30

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किस शफ़क़त में गुँधे हुए मौला माँ बाप दिए
कैसी प्यारी रूहों को मेरी औलाद किया

20

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ये तेरा शफ़्फ़ाफ़ बदन सब फ़ीके हैं
चाँद सितारे लाली सुरमा गहने तक

19

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इतनी सर्दी है कि मैं बाँहों की हरारत माँगूँ
रुत ये मौज़ूँ है कहाँ घर से निकलने के लिए

18

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अफ़्सुर्दगी-ए-इश्क़ के खुलते नहीं अस्बाब
क्या बात भुला बैठे हैं क्या याद नहीं है

12

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हक जताती रह गई दुनिया "शफ़क़"
चूम कर वो तुझ को जूठा कर गई

11

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तुम जो हँसती हो तो मस्ताना कँवल लगती हो
'मीर' का शे'र हो 'ग़ालिब' की ग़ज़ल लगती हो

संग-ए-मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन
साँस लेता हुआ इक ताजमहल लगती हो

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माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है
आज अपने साथ अपना जनम दिन मनाया है

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शफ शब्द भोर के समय की कोमल रोशनी का आभास कराता है, जब दुनिया रात की शांति से दिन की जीवंतता की ओर बढ़ती है। कविता में, यह क्षण अक्सर आशा और नवीनीकरण से भरा होता है, अंधकार और प्रकाश के बीच के नाजुक संतुलन को पकड़ता है।

कवि अक्सर 'शफ' का उपयोग नए आरंभ या एक नई शुरुआत के वादे के प्रतीक के रूप में करते हैं। यह सौंदर्य की क्षणभंगुरता का भी प्रतिनिधित्व कर सकता है, क्योंकि भोर जल्दी ही दिन की पूरी रोशनी में बदल जाती है।

भोर की शांत गोद में, 'शफ' उन संभावनाओं की फुसफुसाहट करता है जो अभी खुलनी बाकी हैं।