तुम जो हँसती हो तो मस्ताना कँवल लगती हो'मीर' का शे'र हो 'ग़ालिब' की ग़ज़ल लगती होसंग-ए-मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदनसाँस लेता हुआ इक ताजमहल लगती हो— Hasrat Jaipuri