Meaning of

शिकस्त

shikast • شکست

हार; असफलता

defeat; failure

شکست; ناکامی

Persian

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी दुनिया से जा मिली

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शिकस्ता दिल शब-ए-ग़म दर्द रुसवाई
अरे इतना तो चलता है मुहब्बत में

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शिकस्ता नाव समझ कर डुबोने वाले लोग
न पा सके मुझे साहिल पे खोने वाले लोग

ज़रा सा वक़्त जो बदला तो हम पे हँसने लगे
हमारे काँधे पे सर रख के रोने वाले लोग

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दीदनी है शिकस्तगी दिल की
क्या इमारत ग़मों ने ढायी है!

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टूटा तो हूँ मगर अभी बिखरा नहीं 'फ़राज़'
मेरे बदन पे जैसे शिकस्तों का जाल हो

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बुरी सरिश्त न बदली जगह बदलने से
चमन में आ के भी काँटा गुलाब हो न सका

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कभी तो नस्ल-ओ-वतन-परस्ती की तीरगी को शिकस्त होगी
कभी तो शाम-ए-अलम मिटेगी कभी तो सुब्ह-ए-ख़ुशी मिलेगी

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साहिल पे क़ैद लाखों सफ़ीनों के वास्ते
मेरी शिकस्ता नाव है तूफ़ाँ लिए हुए

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आजकल के शाइरों तुम शा'इरी तो सीख लो
है तनाफ़ुर क्या शिकस्त-ए-नारवा क्या चीज़ है

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कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला
और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला

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मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी दुनिया से जा मिली

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शिकस्ता दिल शब-ए-ग़म दर्द रुसवाई
अरे इतना तो चलता है मुहब्बत में

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मूल रूप से, 'शिकस्त' एक ठोस हार या नुकसान का भाव देता है। कविता में, यह भावनात्मक और अस्तित्वगत आयामों को छूता है, मानव प्रयासों की नाजुकता और निराशा के अनिवार्य मुठभेड़ों को दर्शाता है।

'शिकस्त' का उपयोग कवि अक्सर व्यक्तिगत असफलता और हार के खट्टे-मीठे स्वभाव की खोज के लिए करते हैं। यह विजय के विपरीत है, नाजुकता में पाई जाने वाली सुंदरता और हार से सीखे गए सबक को उजागर करता है।

कविता में, 'शिकस्त' जीवन की परीक्षाओं के बीच आत्मा की दृढ़ता को दर्शाने वाला दर्पण बन जाता है।