mujh ko meri shikast kii dohri saza mili | मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

  - Saqi Faruqi

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी दुनिया से जा मिली

  - Saqi Faruqi

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    अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
    मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन
    Saqi Faruqi
    मुद्दत हुई इक शख़्स ने दिल तोड़ दिया था
    इस वास्ते अपनों से मोहब्बत नहीं करते
    Saqi Faruqi
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    बदन चुराते हुए रूह में समाया कर
    मैं अपनी धूप में सोया हुआ हूँ साया कर

    ये और बात कि दिल में घना अँधेरा है
    मगर ज़बान से तो चाँदनी लुटाया कर

    छुपा हुआ है तिरी आजिज़ी के तरकश में
    अना के तीर इसी ज़हर में बुझाया कर

    कोई सबील कि प्यासे पनाह माँगते हैं
    सफ़र की राह में परछाइयाँ बिछाया कर

    ख़ुदा के वास्ते मौक़ा न दे शिकायत का
    कि दोस्ती की तरह दुश्मनी निभाया कर

    अजब हुआ कि गिरह पड़ गई मोहब्बत में
    जो हो सके तो जुदाई में रास आया कर

    नए चराग़ जला याद के ख़राबे में
    वतन में रात सही रौशनी मनाया कर
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    Saqi Faruqi
    दुनिया पे अपने इल्म की परछाइयाँ न डाल
    ऐ रौशनी-फ़रोश अँधेरा न कर अभी
    Saqi Faruqi
    ये ख़ामुशी का ज़हर नसों में उतर न जाए
    आवाज़ की शिकस्त गवारा न कर अभी
    Saqi Faruqi

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