Meaning of

सिसक

sisak • سسک

सिसकी; हल्की रोना

sob; gentle weeping

سسکی; ہلکی رونا

Unknown

सदा सुनाई पड़ी सिसकियों की कानों में
महीनों बा'द में जब उस को फ़ोन मैं ने किया

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तुम्हारे बिन गुज़ारी रात के बस दो ही क़िस्से हैं
कभी हिचकी नहीं रुकती कभी सिसकी नहीं रुकती

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आख़िर कौन सिसकता है तेरे अंदर
आज उदासी ने भी पूछ लिया मुझ सेे

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इस लिए नहीं रोया अश'आर में
वज़्न से बाहर थी मेरी सिसकियाँ

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गए ज़माने की चाप जिन को समझ रहे हो
वो आने वाले उदास लम्हों की सिसकियाँ हैं

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हमारे ख़ौफ़ से बाज़ार उछलते हैं जहाँ भर में
सिसकने से हमारे कौन सी सरकार गिरती है

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ये सोच कर के कि उस ने किया है याद मुझे
मैं मेरी उँगलियों पे हिचकियों को गिनता रहा

पलट के उस ने कराया न मुझ को चुप लेकिन
तमाम रात मेरी सिसकियों को गिनता रहा

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ये क्या तिलिस्म है क्यूँँ रात भर सिसकता हूँ
वो कौन है जो दियों में जला रहा है मुझे

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थोड़ी सिसकी थोड़ी ठिठकी पागल होना अच्छा है
जग की गाथा गाने वाले तेरा रोना अच्छा है

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शब-ए-हिज्राँ में सुनता था, सलीब-ए-वक़्त की सिसकी
ये कुछ पागल समझते हैं घड़ी आवाज़ करती है

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सदा सुनाई पड़ी सिसकियों की कानों में
महीनों बा'द में जब उस को फ़ोन मैं ने किया

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तुम्हारे बिन गुज़ारी रात के बस दो ही क़िस्से हैं
कभी हिचकी नहीं रुकती कभी सिसकी नहीं रुकती

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सिसक शब्द दुःख की एक मूक, संयमित अभिव्यक्ति को दर्शाता है। कविता में, यह एक दिल के धीरे-धीरे टूटने की नाजुक ध्वनि को पकड़ता है, जो व्यक्तिगत और सार्वभौमिक दोनों है।

कवि अक्सर 'सिसक' का उपयोग प्रेमी के मौन दुःख को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह बिना आवाज़ के गिरने वाले आँसुओं की ध्वनि है, दिल के मूक विलाप की गूंज।

अपनी शांति में, 'सिसक' मानव स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहता है। यह आत्मा के गहरे दुःखों की एक फुसफुसाहट है।