ye kya tilism hai kyun raat bhar siskata hoon | ये क्या तिलिस्म है क्यूँ रात भर सिसकता हूँ

  - Saqi Faruqi

ये क्या तिलिस्म है क्यूँ रात भर सिसकता हूँ
वो कौन है जो दियों में जला रहा है मुझे

  - Saqi Faruqi

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    मैं फिर से हो जाऊँगा तन्हा इक दिन
    बैन करेगा रूह का सन्नाटा इक दिन

    जिन में अभी इक वहशी आग के साए हैं
    वो आँखें हो जाएँगी सहरा इक दिन

    बीत चुका होगा ये ख़्वाबों का मौसम
    बंद मिलेगा नींद का दरवाज़ा इक दिन

    मिट जाएगा सेहर तुम्हारी आँखों का
    अपने पास बुला लेगी दुनिया इक दिन

    डूब रहा हूँ झूट और खोट के दरिया में
    जाने कहाँ ले जाए ये दरिया इक दिन

    मैं भी लौट आऊँगा अपने तआ'क़ुब से
    तुम भी मुझ को ढूँढ के थक जाना इक दिन
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    Saqi Faruqi
    मुझ में सात समुंदर शोर मचाते हैं
    एक ख़याल ने दहशत फैला रक्खी है
    Saqi Faruqi
    वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन
    इक रात के राही हैं गुज़र जाएँगे इक दिन

    यूँ दिल में उठी लहर यूँ आँखों में भरे रंग
    जैसे मिरे हालात सँवर जाएँगे इक दिन

    दिल आज भी जलता है उसी तेज़ हवा में
    ऐ तेज़ हवा देख बिखर जाएँगे इक दिन

    यूँ है कि तआक़ुब में है आसाइश-ए-दुनिया
    यूँ है कि मोहब्बत से मुकर जाएँगे इक दिन

    यूँ होगा कि इन आँखों से आँसू न बहेंगे
    ये चाँद सितारे भी ठहर जाएँगे इक दिन

    अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
    मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन
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    Saqi Faruqi
    इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते
    ये बात किसी और से कह भी नहीं सकते
    Saqi Faruqi
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    बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई
    मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा
    Saqi Faruqi
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