Meaning of

सुबह-ओ-शाम

subh-o-shaam • صبح و شام

सुबह और शाम; दैनिक दिनचर्या

morning and evening; daily routine

صبح و شام; روزمرہ کی روٹین

Arabic

यूँँ सुब्हो-शाम इसे सीने में जगह देकर
हमीं ने दर्द की आदत बिगाड़ रक्खी है

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मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तेरे फ़िराक़ में यूँँ सुबह-ओ-शाम करते हैं

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ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना
थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें

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हज़ारों बार लिख लिख कर यही पैग़ाम करता है
तेरे चुंबन के बदले जान तेरे नाम करता है

मेरे महबूब मुझ को तेरे आँखों की क़सम है ये
तेरा महबूब तुझ को याद सुब्ह-ओ-शाम करता है

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सुब्ह-ओ-शाम अब हम को बस उदास रहना है
ग़मज़दों की मंज़िल का रास्ता उदासी है

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कुछ काम-धाम है ही नहीं और क्या करें
दिन-रात सुब्हो-शाम चलो मशविरा करें

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ज़िम्मेदारी शाने पर शुभ क़िस्मत ज़ात नहीं है
इश्क़ मोहब्बत यार हमारे बस की बात नहीं है

कूचा कूचा डिग्री ले कर फिरते हैं सुब्ह-ओ-शाम
काम नहीं मिलता है पास बसर-औक़ात नहीं है

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आज दिल में तमाम बातें हैं
हाँ, मगर ये तो आम बातें हैं

आप की सुबह-ओ-शाम यादें हैं
आप की सुबह-ओ-शाम बातें हैं

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अदू होते रहे अहबाब कैसी ये करिश्माई,
इसी तदबीर में मैं रोज़ सुब्ह-ओ-शाम रहता था।

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लबों पर अपने तब्बसुम नहीं सजाऊँगी
ग़म-ए-फ़िराक़ तेरा उम्र भर मनाऊँगी

'शजर' ये वा'दा है जब तक है मेरे जिस्म में जाँ
मैं तेरी गज़लें सुब्ह-ओ-शाम गुनगुनाऊँगी

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यूँँ सुब्हो-शाम इसे सीने में जगह देकर
हमीं ने दर्द की आदत बिगाड़ रक्खी है

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मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तेरे फ़िराक़ में यूँँ सुबह-ओ-शाम करते हैं

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'सुबह-ओ-शाम' वाक्यांश दैनिक जीवन की लय को पकड़ता है, अस्तित्व की चक्रीय प्रकृति को दर्शाता है। यह समय के प्रवाह, परिवर्तन की स्थिरता, और साधारण में पाई जाने वाली सुंदरता को जगाता है।

कवि 'सुबह-ओ-शाम' का उपयोग समय के प्रवाह, जीवन की दिनचर्या, और इसके भीतर होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों पर विचार करने के लिए करते हैं। यह प्रेम की स्थिरता या भाग्य की अनिवार्यता का प्रतीक हो सकता है।

कविता में, 'सुबह-ओ-शाम' जीवन के क्षणभंगुर क्षणों और उनके भीतर की स्थायी सुंदरता की याद दिलाता है।