
लबों पर अपने तब्बसुम नहीं सजाऊँगी
ग़म-ए-फ़िराक़ तेरा उम्र भर मनाऊँगी
'शजर' ये वा'दा है जब तक है मेरे जिस्म में जाँ
मैं तेरी गज़लें सुब्ह-ओ-शाम गुनगुनाऊँगी
— Shajar Abbas
Other sher from the same pen
Shers of shajar.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling