सुख का क्या है यार भला ये आता जाता रहता है
दुख तो अपना साथी है ये साथ निभाता रहता है
भटके अर्जुन को समझाने गीता ज्ञान सुनाया था
वक़्त रहे तुम भी समझो वो ये समझाता रहता है
प्रेम की ख़ातिर ग्वाला बन कर रख अधरों पे वंशी को
चक्र चलाने वाला कान्हा राग बजाता रहता है
धन की चाहत ख़त्म न होती चैन भला कैसे मिलता
हम लालच में आ जाते हैं लोभ लुभाता रहता है
धीरे धीरे यार समय का पहिया अपनी चाल चले
हम तो बस कठपुतली हैं कोई और चलाता रहता है
जीत भला कैसे सकते हो उस की सत्ता के आगे
उस के हाथ में चाबी है वो चाल बढ़ाता रहता है
— Jitendra "jeet"















