kahiin par door dariyaa ke kinaaron par khade hain ham | कहीं पर दूर दरिया के किनारों पर खड़े हैं हम

  - Kushal "PARINDA"

कहीं पर दूर दरिया के किनारों पर खड़े हैं हम
तेरे दिल से निकाले दर-बदर होकर खड़े हैं हम

मुझे तुम सेे मोहब्बत है इधर देखो न तुम जानाॅं
तुझे पाने की ख़ातिर हर जगह मिटकर खड़े हैं हम

बड़े-बूढ़ों ने जब पूछा नगर कैसे जवाँ है ये
कहा हमने लुटाकर गाँव जो डटकर खड़े हैं हम

उजालों की तमन्ना में जले हर रात अंदर से
मगर हर सुब्ह दुनिया के लिए बाहर खड़े हैं हम

ख़बर तक भी नहीं तुझको कि कैसे दिन गुज़ारे हैं
उसी पल में जहाँ तू भूल बैठा घर खड़े हैं हम

न पूछो कैसे काटी हैं ये रातें जागते जागे
परिंदा जैसे शाख़ों पर बिना हमपर खड़े हैं हम

  - Kushal "PARINDA"

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