सलीक़े से निभाना चाहते हैं
किसी रुत को सजाना चाहते हैं
हमें आदत है दिल को भी जलाना
मगर तुम को बचाना चाहते हैं
उजालों की तलब रखते हैं फिर भी
अँधेरों में ठिकाना चाहते हैं
जो हम को रूह से बढ़कर कभी थी
उसे अब भूल जाना चाहते हैं
जो अपनी बात करता है ग़ज़ल में
उसे ही आज़माना चाहते हैं
— Kushal "PARINDA"















