कोई भी चाल मेरे हक़ में नहीं
सूरत-ए-हाल मेरे हक़ में नहीं
वो गुज़श्ता दिनों मुयस्सर था
ये मह-ओ-साल मेरे हक़ में नहीं
गर्दिश-ए-बख़्त का तसल्लुत है
कुछ भी फिलहाल मेरे हक़ में नहीं
कैसे ख़ुशियाँ मनाऊँ तेरे बग़ैर
ईद-ए-शव्वाल मेरे हक़ में नहीं
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