कोई भी चाल मेरे हक़ में नहीं
सूरत-ए-हाल मेरे हक़ में नहीं
वो गुज़श्ता दिनों मुयस्सर था
ये मह-ओ-साल मेरे हक़ में नहीं
गर्दिश-ए-बख़्त का तसल्लुत है
कुछ भी फ़िलहाल मेरे हक़ में नहीं
कैसे ख़ुशियाँ मनाऊँ तेरे बग़ैर
ईद-ए-शव्वाल मेरे हक़ में नहीं
— Meem Maroof Ashraf















