जिस्म का बोझ उठाए हुए चलते रहिएधूप में बर्फ़ की मानिंद पिघलते रहिएये तबस्सुम तो है चेहरों की सजावट के लिएवर्ना एहसास वो दोज़ख़ है कि जलते रहिएअब थकन पाँव की ज़ंजीर बनी जाती हैराह का ख़ौफ़ ये कहता है कि चलते रहिएज़िंदगी भीख भी देती है तो क़ीमत ले कररोज़ फ़रियाद का अंदाज़ बदलते रहिए— Meraj Faizabadi