charaagh-e-dahr yuñ jalta nahin hota | चराग़-ए-दहर यूँँ जलता नहीं होता

  - Raj Tiwari

चराग़-ए-दहर यूँँ जलता नहीं होता
हवा का रुख़ अगर बदला नहीं होता

रुकूँ तो फिर कोई मंज़िल नहीं दिखती
चलूँ तो फिर कोई रस्ता नहीं होता

वफ़ादारी अदाकारी नहीं होती
हर इक के चेहरे पर चेहरा नहीं होता

परी-ज़ादी हमें भी दिखती ये दुनिया
अगर हम ने तुम्हें देखा नहीं होता

असीर-ए-इश्क़ हूँ शहर-ए-मुहब्बत में
जो तन्हाई में भी तन्हा नहीं होता

खुलेंगी सब किताबें 'इश्क़ की उस जगह
जहाँ पर जिस्म का पर्दा नहीं होता

ये पौधे धूप में सँवला गए होते
अगर इनके लिए गमला नहीं होता

जो बनती जोड़ियाँ गर आसमानों में
किसी के साथ फिर धोका नहीं होता

मिरे होने से आख़िर क्या हुआ है 'राज'
न होता मैं अगर तो क्या नहीं होता

  - Raj Tiwari

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