मेरा दिल अब नहीं लगता है किसी दिल के साथ
ग़ालिबन जीना पड़ेगा इसी मुश्किल के साथ
वो मिरी पहली मुहब्बत थी उसे जाना था
आख़िरी रास्ता ही मिलता है मंज़िल के साथ
दरिया को देखा तो फिर हुस्न समझ आया मुझे
लहरें टिकती नहीं हैं दामन-ए-साहिल के साथ
वो जो बे-हिस था मुहब्बत की ग़ज़ल लिखने लगा
सोचिए कुछ तो हुआ होगा उस इक दिल के साथ
हवा के साथ चराग़ों का यूँँ जलते रहना
मरने वाला चले जैसे किसी क़ातिल के साथ
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