फूलों के जिस्म पे शबनम की तरह बैठी हुई

ज़रा-सी धूप से ओझल हो गई मेरी ख़ुशी

शाम को दोनों किसी मोड़ पे चल मिलते हैं

मैं भी दिन भर का थका-हारा तू भी रात जगी
नींद में होंठों से उस ने मिरी आँखों को छुआ

मेरी पलकों से महक चाँदनी की आती रही

— Raj Tiwari

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