जाँन-ए-जाँ एक नज़र शाम के बा'द
मुझ को जाना है मग़र शाम के बा'द
सर्द रातों को लिहाफ़ों से है बैर
तुमको भी होगी ख़बर शाम के बा'द
आज फिर दोस्त कहीं कोई छला
टूट जाते हैं जिगर शाम के बा'द
सर्द रातों को भी अँगड़ाई न हो
जब हो बे-कैफ़ नज़र शाम के बा'द
और इक रात तमाशा करो आज
क्या पता हो ही ख़बर शाम के बा'द
अब तो मिलने का इरादा भी है नइँ
कितनी डरती है नज़र शाम के बा'द
और क्या होगा अगर हम ही न हों
लोग जाते ही हैं घर शाम के बा'द
ख़ैर ये मौत मेरे सर से टली
कितना दिलकश है नगर शाम के बा'द
तू भी ऐ दोस्त कभी ईद मना
देख ले तू भी क़मर शाम के बा'द
दिल-ए-नादाँ नहीं इतना नहीं है
हो ही जाती है सहर शाम के बा'द
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