उसी के रंग में अब ढल चुकी हूँ
किसी की सम्त इतना चल चुकी हूँ
उतरता ही नहीं है रंग जिस का
मैं ऐसी ख़ाक तन पर मल चुकी हूँ
मैं क्यूँ ना ग़ैर को अपना बनाऊँ
अगर अपनों के दिल को खल चुकी हूँ
किसी के मन की भी मैं हो न पाई
और अपने आप को भी छल चुकी हूँ
कोई भी रंग अब भाता नहीं है
मैं अपने आप में अब ढल चुकी हूँ
— shampa andaliib















