उसी की दीद हर ग़म की शिफ़ा थी

कभी इक अप्सरा दिल की दवा थी

अभी के ज़ख़्म ख़ाली जेब के हैं
मोहब्बत तो पुराना हादसा थी

मिरे अश्कों को अब लगने लगा है
कि उल्फ़त ही ग़मों की वालिदा थी

लगेंगी हिज्र में बेज़ार ग़ज़लें
जो दौर-ए-वस्ल लगती ख़ुशनुमा थी

वो लड़की 'शान' अब दिखती नहीं है
तुम्हारे शे'र का जो क़ाफ़िया थी

— Shan Sharma

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