खोलकर रख दूँ मैं सब जज़्बात तन्हा

उन से हो गर मेरी कोई बात तन्हा

आज फिर से वो गई है अपने घर को
आज फिर गुज़रेगी मेरी रात तन्हा

साथ मेरे सब थे फिर भी लगता है ये
जैसे गुज़रे हों सभी लम्हात तन्हा

लोग जो मुझ को हराना चाहते हैं
मैं दे सकता हूँ कि इनको मात तन्हा

इस मुहब्बत में मिला कुछ भी नहीं , बस
रह गया इक हाथ में इक हाथ तन्हा

— karan singh rajput

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