बदला समय नज़र से उतरने के दिन गए

या'नी के अब वो डूब के मरने के दिन गए

लगता है रुख़ को मोड़ के रख देंगे ये शजर
पत्तों के अब हवा में बिखरने के दिन गए

ऐ मनचलों न आएँगी ये जाल में कभी
अब लड़कियों के कान कुतरने के दिन गए

बुझते हुए चराग़ से क्या इश्क़ विश्क़ हो
वो कमसिनी की उम्र सँवरने के दिन गए

रख आइए जला के दिया छत पे ऐ शिवांग
अब आँधियों के शोर से डरने के दिन गए

— Shivang Tiwari

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