Shivang Tiwari

Shivang Tiwari

@shivang021

Shivang Tiwari shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shivang Tiwari's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

5

Content

129

Likes

679

Shayari
Audios
  • Sher(42)
  • Ghazal(72)
  • Nazm(15)

Sher

देखिए दूध का धुला नहीं हूँ हाँ मगर उतना भी बुरा नहीं हूँ — Shivang Tiwari
जिन की आँखों में चुभ रहा हूँ आज कल मुझे देखने को तरसेंगे — Shivang Tiwari
मैं हिज्र का मारा हुआ हूँ इस लिए मुझ को दुआएँ दे दवाई रहने दे — Shivang Tiwari
गर दिखाना है तो ता-उम्र दिखा ये जज़्बा एक दिन का ये तिरा इश्क़-ए-वतन ठीक नहीं — Shivang Tiwari
मैं तेरी दुश्मनी को कुछ दिनों में भूल जाता हूँ मगर वो दोस्ती मुझ को अभी भी याद आती है — Shivang Tiwari
अच्छी लगी है उस की कोई बात आप को जिस का ख़याल आ रहा दिन-रात आप को — Shivang Tiwari
एक क़िस्मत है जो लाती है ख़रीदार मगर एक तक़दीर है सौदा नहीं होने देती — Shivang Tiwari
वादी झरने बर्फ़ की बातें करता है वो दिल ही में कश्मीर बसाए बैठा है — Shivang Tiwari
मिरी अना की आबरू उछाल कर चला गया ये साल फिर से वहशतों में डाल कर चला गया — Shivang Tiwari
तलवार तेरे तीर या ख़ंजर के बराबर वो आज अकेला ही था लश्कर के बराबर — Shivang Tiwari

Ghazal

वफ़ा सब से निभाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते हमारा ख़ूँ जलाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते हमारे ख़्वाब में आ कर दरीचा खटखटाते हो मगर फिर लौट जाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते तुम्हारा ज़िक्र होता है छलक पड़ती हैं ये आँखें हमें इतना रुलाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते हमें तुम रोज़ कहते हो मिलेंगे रात को छत पर मगर फिर भूल जाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते लबों के पास तक आ कर जो रस्ता मोड लेते हो तहम्मुल आज़माते हो ये तुम अच्छा नहीं करते हमीं से है तुम्हें निस्बत ये तुम दिन रात कहते हो हमीं से ऊब जाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते हमें मालूम है यारा तुम्हारा हाल-ए-दिल हम सेे 'शिवांग' अब भी छुपाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते — Shivang Tiwari
राज़ अब सारे बताने हैं मुझे ज़ख़्म सब अपने दिखाने हैं मुझे कह न पाऊँगा उसे फिर हाल-ए-दिल हर्फ़ काग़ज़ पे सजाने हैं मुझे कर यक़ीं वादे पे उस के आज भी नैन अपने फिर थकाने हैं मुझे जोड़ने हैं चंद सिक्के रोज़ ही और बच्चे भी पढ़ाने हैं मुझे मेरी जितनी हैसियत है बज़्म में शे'र उतने ही सुनाने हैं मुझे पास्ता बर्गर समोसे छोड़ कर दाल चावल घर के खाने हैं मुझे जोड़ने हैं रोज़ टुकड़े धूप के स्याह कोने जगमगाने हैं मुझे चूड़ियाँ कंगन उसे भाते नहीं कान के झुमके दिलाने हैं मुझे आगे बढ़ना ही मेरा मक़सद नहीं जो गिरें वो भी उठाने हैं मुझे कर रहा हूँ पैरवी गुलशन की तो फूल पत्ते सब चुराने हैं मुझे कोई बैचैनी कोई उजलत नहीं शे'र धीरे से पकाने हैं मुझे — Shivang Tiwari
फिर न तड़पाएगी ये रात चलो साथ चलें तुम पकड़ लो न मेरा हाथ चलो साथ चलें साथ चलना ही बस इक हल है मसाइल का सनम सब बदल जाएँगे हालात चलो साथ चलें सामना इस का अकेले नहीं कर पाऊँगा तेज़ होने लगी बरसात चलो साथ चलें वहशत-ए-उम्र-ए-रवाँ क़हर-बपा है यूँँ भी चाहता हूँ मैं तेरा साथ चलो साथ चलें ज़िंदगानी का सफ़र तन्हा कटा है किस सेे मान जाओ न मेरी बात चलो साथ चलें कितने बेताब हैं मिलने को बिछड़ कर फिर से देखिए अर्ज़-ओ-समावत चलो साथ चलें शब-ए-हिज्राँ के सितम टूट पड़ेंगे तुम पर होगा मुश्किल गुज़र-औक़ात चलो साथ चलें दूरियाँ फ़ासले रंजिश कि मुसावात 'शिवांग' हैं बिछड़ने की अलामात चलो साथ चलें — Shivang Tiwari
ग़मों से चूर होना चाहता हूँ मैं तुम सेे दूर होना चाहता हूँ मुझे आसाइशें दुख दे रही हैं ज़रा मजबूर होना चाहता हूँ मज़ाहिब का निशाना ले लिया है ज़रा मशहूर होना चाहता हूँ तुम्हारे शहर वालों में वफ़ा का कोई दस्तूर होना चाहता हूँ मुझे सादा-दिली तड़पा रही है ज़रा मग़रूर होना चाहता हूँ अँधेरों से मेरा रिश्ता नहीं है मैं अब पुर-नूर होना चाहता हूँ जहाँ भर की निगाहों में रहूँगा मैं कोह-ए-तूर होना चाहता हूँ ज़ियादा कुछ नहीं माँगा ख़ुदा से तेरा सिंदूर होना चाहता हूँ ख़बर तो हो मशक़्क़त की मुझे भी कोई मज़दूर होना चाहता हूँ तुम्हारी हाँ मुझे काफ़ी नहीं है उसे मंज़ूर होना चाहता हूँ — Shivang Tiwari

Nazm

"आख़िरी मोहब्बत" तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं वक़्त थम जाए बस इस लम्हे में और कोई दरकार नहीं तेरे बिना सब सूना है तेरे साथ सब पूरा ख़्वाबों में तेरी परछाईं हक़ीक़त में तू मंज़िल मेरे दिल की हर इक धड़कन तेरे नाम की हाज़िरी है पहली मोहब्बत में थे ख़्वाब बहुत आख़िरी में सच्चाई है पहली में थी मासूमियत शायद आख़िरी में गहराई है तू वो किताब है जिस के हर पन्ने पे मैं बिखरा हूँ जिस में ख़ुद को बार-बार ढूँढा तू वो पन्ना है जो मुड़ा नहीं कभी तू आख़िरी मोहब्बत है अब और कुछ माँगा नहीं मैं ने तेरी हँसी में है एक सुकून तेरे आँसुओं में मेरी दुआ तेरे नाम में खोया हुआ तेरे प्यार में पाया ख़ुदा तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं जिस दिन भी ख़त्म हो जाएँ साँसें तू मेरे साथ हो यही आरज़ू है मेरी — Shivang Tiwari
“अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं” ख़्वाबों की छतरियों तले जब कोई मेरी उदासी का शबब पूछता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं किसी क़फ़स में सदियों से बैठे किसी मुज़रिम की उदास आँखों से निकलती हुई बूँद जब उस के गालों को सहलाती है या किसी अनचाहे मौसम की कोई बहार मुझे पुकारती है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं अर्श के मानिंद कोई था मेरे लिए कभी उस की याद में तो कभी उस के साथ गुज़रे लम्हों में खोने की तलब जब बेचैन करती है एक आह दिल से निकलती है जब कोई ग़म मन में तूफान लाता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं जिसे ख़ुदा मानकर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था मैं ने जिस की ओर उस के दामन में भीड़ हज़ारों की है गै़रों से यूँँ मुख़्तलिफ़ होने की तलब उस के दिल को ज़रा भी नहीं तड़पाती जब ये ख़याल मन में उठता है मेरे तो अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं मेरी ख़ुद्दारी का शबब उसे पसंद नहीं मेरे एहसासों की जिसे क़दर नहीं जिस के लिए तड़पा है दिन रात ये दिल उसे मेरे ख़ुश रहने की कोई फ़िक्र नहीं छोड़ दिया उसे भी कोई ग़ैर समझकर जो अपना बना कर गै़रों सा रहा अक़्सर फिर भी जब उस की याद सताती है मुझे अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं — Shivang Tiwari
“मोहब्बत” न कोई फ़साना है न कोई कहानी है मेरी मैं कोई राजा तो नहीं,पर एक रानी है मेरी ज़्यादा लंबी नहीं एक मुख़्तसर सी कहानी है मेरी एक वो हसीना जिस में था रूह कब्ज़ करने का हुनर उस के क़ब्ज़े में हम आ गए बस यहीं परेशानी है मेरी फिर उस सेे आख़िर में हम को इश्क़ हो गया शायद यही हम से एक जु़र्म हो गया ये सब करने के बा'द बस एक तजुर्बा हाथ आया जो कहते हैं मोहब्बत में कुछ नहीं उन को देने के लिए एक जवाब हाथ आया भाव बढ़ जाते हैं इज़हार-ए-मोहब्बत से इन के ये तजुर्बा भी हम को ये काम करने के बा'द आया किसी दीवार पे लिखा था मोहब्बत जु़र्म है मैं ने उस को उतारा और फाड़ आया आख़िर मुझे इस सेे तजुर्बा जो हाथ आया — Shivang Tiwari
“डर” बस यही सोच कर मैं डर रहा हूँ अगर कहूँ मैं कि प्यार है तुम सेे तो न जाने फिर क्या जवाब दोगी करोगी रुसवा ज़माने में शायद या फिर कहोगी मुझ को प्रेम रोगी बस यही सोच कर मैं बिखर रहा हूँ मना करोगी तुम तो क्या कहूँगा अपने ही मन में मैं सोचा करूँँगा नहीं करूँँगा अब इश्क़ तुम न ही अब तुम को देखा करूँँगा बस यही सोच कर मैं मर रहा हूँ की जीवन अब कैसे कटेगा मेरा क़रीब में तन्हा सा बिस्तर रखूँगा उसी पे रोया करूँँगा शब भर उसी पे अपनी आख़िरी साँस लूँगा बस यही सोच कर मैं डर रहा हूँ अगर कहो तुम हाँ मोहब्बत है तुम सेे तो मारे ख़ुशी के मैं मर ना जाऊँ तुम्हारी ना से तो मैं मर गया था तुम्हारी हाँ से भी कहीं मर ना जाऊँ — Shivang Tiwari
"सिगरेट की राख" धुएँ का बादल जो हर पल उठता है जैसे जीवन की हर साँस जलती है सुलगती सिगरेट जैसे एक उम्मीद जो धीरे-धीरे राख बनकर बिख़रती है हर कश में कुछ खो जाता है जैसे सपने किसी कोने में दब जाते हैं हाथों में थमी ये पतली सी चीज़ जैसे ज़िन्दगी की एक छोटी सी ख़्वाहिश जलते हैं होंठ जलते हैं ख़्वाब हर धुएँ में दिखता है दिल का अज़ाब मगर क्या मिला इस आग में सिर्फ़ राख और कुछ सूनी यादें सिगरेट बुझती है पर जलना जारी है जैसे दिल के कोने में कोई दर्द भारी है मगर कौन समझे इस धुएँ की सच्चाई जो दिखता है वो सिर्फ़ पल भर की रिहाई ये सिगरेट बस एक आदत नहीं जैसे ज़िन्दगी की कोई छुपी हुई बेबसी है हर सुलगता कश एक चीख सुनाता है जो शायद किसी ने कभी समझा ही नहीं — Shivang Tiwari
“शाख़” एक ज़र्द सी शाख़ राख कर जा रहा हूँ तेरे लिए जब इस शाख़ पर फूल खिल जाएँगे और ज़िंदगी की रेखा सब्ज़-रंग होगी तब मैं नहीं रहूँगा मगर तुम्हें ये महसूस होगा कि ये मेरी ही ख़ुश्बू है मेरा ही है ये रंग-ए-बहार मिट्टी बग़ैर पानी बग़ैर ज़िंदा रहेगी ये शाख़ ये कभी हुआ करती थी मेरी रूह के शजर की आँख आँखों को दिखाई दे ऐसी बारिश की ज़रूरत नहीं इसे इस की इक उम्र गुज़र चुकी है धूप में उड़ाते हुए ख़ाक ये शाख़ किसी शाही फूलों की नहीं है बिल्कुल मगर इतनी भी बेकार नहीं की इस पे कोई फूल ही न आए हर एक चीज़ के लिए चाहिए होता है एक वक़्त और बस इसी चीज़ की कमी थी हम दोनों की ज़िंदगी में फ़क़त अपनी सारी हयात बीत गई बादलों की परछाइयाँ गिन ने में किसी ने अगर पूछा तुम से तो बेशक कहना कभी कभी ऐसे बेकार काम भी करने ज़रूरी हैं अपने ही रूह के छाले कभी सिलने में कभी छिलने में सच कहूँ तो हरी-भरी ही शाख़ देनी थी तुम्हें मगर ये पता न था की ख़्वाहिशों से ज़्यादा साँसे कम पड़ जाएगी मगर ठीक है अब जो हुआ सो हुआ,अब तो तुम्हें, बहार और पतझड़ की बहुत अच्छे से समझ आएगी इस शाख़ की पोरों में अपनी कुछ परछाइयाँ रख दी हैं मैं ने जैसे सुकूत-ए-ज़िंदगी में दिल की कुछ बे-ताबियाँ रख दी हैं मैं ने कहीं ऐसा न हो कि मैं दूर ख़ुद अपने आप से हो जाऊँ मेरी हस्ती के हंगामों में कुछ तन्हाइयाँ रख दी हैं मैं ने मेरे शाहकार मेरे अफ़्कार हो जाएँ न फ़र्सूदा ज़माने में इस लिए निगाहों में तुम्हारी कुछ गहराइयाँ रख दी हैं मैं ने मेरा हर इज़्तिराब-ए-दिल निशाँ मंज़िल का बन जाए तमन्नाओं में तेरी हिज्र की अंगड़ाइयाँ रख दी हैं मैं ने किसी भी ग़ैर की जा़निब नज़र नहीं उठेगी मेरी मेरी निगाहों में तुम्हारी सब रानाइयाँ रख दी हैं मैं ने — Shivang Tiwari
“है एक ऐसी भी लड़की” वो इश्क़ है वो वफ़ा है वो आयत है, इबादत है वो दुआ है, वो आमीन है वो सच है, वो यक़ीन है वो मेरी धूप है, छाँव है आसमाँ है, ज़मीन है है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है वो थोड़ी सी पागल है थोड़ी थोड़ी ज़हीन है, उस की हरकतों में अल्हड़पन, जिस का नक़्श आ'ला जिस का चर्बा हसीन है, हर भौंरा दिवाना उस का जो बर्ग-ए-गुल पे नशीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो इस क़दर माहेरीन है वही मेरी दामन भी है वही मेरी आस्तीन है, वो इमली सी खट्टी है शहद सी मीठी है, कभी वो चटपटी सी कभी वो नमकीन है, वो एक उम्दा परवाज़ है एक आ'ला शाहीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो मेरी दुनिया है, जहान है मेरी पगड़ी है, ज़बीन है, मेरा क़लमा है, ईमान है वो एक तशरीह-ए-दीन है, वो बर्ग-ए-गुल है, काँटा है वो मतीन है, वो महीन है, वो नील-कँवल है, गुलाब है, एक गुलदस्ता रंगीन है, मैं अब क्या क्या लिखूँ सर से पाँव तक वो हसीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। — Shivang Tiwari
"अफ़साना" मंटो के अफ़साने से तुम बिन्दास ख़यालों से किसी शाइ'र की शा'इरी नहीं किसी अफ़साना नगर की कल्पनाओं से तुम परे इस जहाँ से मेरे दिन के हसीन ख़्वाबों से जज़ीरा तुम्हारा तलाश रहा मिल रहा संकेत हवाओं से न कोमल न नाज़ुक न कोई बात कभी मन में रखीं न बनावटी नाराज़गी न झूठी कोई सखी तुम हक़ीक़त तुम ही ख़्वाब तुम शा'इरी तुम अफ़साना तुम हो हर्फ़-ए-गुलज़ार तुम सेे मिलन एक बार हक़ीक़त न सही ये दिन के ख़्वाबों का प्यार उसी जज़ीरे पर मिलेंगे जहाँ न होगा कोई अय्यार न कोई हथियार वो जहाँ होगा हमारा वो जज़ीरा होगा हमारा जब मिलन होगा हमारा तब अफ़साना ख़त्म होगा तुम्हारा — Shivang Tiwari