“मंज़िल”

सिर्फ़ अपने लिए ही सब अच्छा तलाशना
कहते हैं इस को ही सब से घटिया तलाशना
उम्र थक चुकी है अब, इस बेकार काम से
मंज़िल तलाशना तो कभी रस्ता तलाशना
रूबरू तुझ को देख कर ख़ुद को ढूँढ़ता हूँ मैं
फिर तन्हाई में बैठ कर तेरा चेहरा तलाशना
पहले तो जान ले कर, बेजान कर दिया
फिर उस
में काट-छाँट कर बढ़िया तलाशना
हो जो रंगो से भी रंगीन, ऐसी दुनिया कहाँ
नामुमकिन है कोई दूजा हिंदोस्ताँ तलाशना
हो काश ये ख़ुशी भी तुम को मुयस्सर "शिवम्"
"प्रगति" के वास्ते एक प्यारा सा दुल्हा तलाशना

— Shivang Tiwari

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