क्या ख़ाक सुकूँ चैन भी आता नहीं जानाँ
अब दर्द मेरे दिल को लुभाता नहीं जानाँ
जी खोल के जी लीजिए क़ुर्बत के पलों को
जो वक़्त गुज़र जाए फिर आता नहीं जानाँ
मतलब ही छुपा होगा सहारा न समझिए
बेवजह कोई हाथ मिलाता नहीं जानाँ
इस से ही समझ लीजिए ख़ुद-ग़र्ज़ी-ए-दुनिया
अब ज़हर कोई मुफ़्त पिलाता नहीं जानाँ
अब इसको हवस भी न कहें यार कहें क्या
आशिक़ तो कभी छोड़ के जाता नहीं जानाँ
बेहतर है जलाओ नहीं तुम प्यार के दीपक
सहरा में कोई फूल उगाता नहीं जानाँ
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