मेरी बेताब आँखों को देखा नहीं
और कहती हो मैं कुछ भी कहता नहीं
प्यार है इनको तो लौट आएँगे ये
मैं परिंदों के पर तो कतरता नहीं
चाहे कितना डरूँ तीरगी से तो मैं
फिर भी बेटी से कहता हूँ डरता नहीं
मेरी सीरत महकती रहेगी सदा
इत्र से देर तक तन महकता नहीं
ख़्वाब आँखों में ही मेरे मर जाते हैं
खारे पानी में कुछ भी पनपता नहीं
हौसला और बढ़ जाता है हार के
गिरता हूँ फिर भी देखो बिखरता नहीं
जो मिला है उसी पे बहुत नाज़ है
झोलियाँ देख ग़ैरों की जलता नहीं
वक़्त लगता है मंज़र बयाँ करने में
मैं कभी शे'र उजलत में कहता नहीं
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