"अफ़साना"
मंटो के अफ़साने से
तुम बिन्दास ख़यालों से
किसी शाइ'र की शा'इरी नहीं
किसी अफ़साना नगर की कल्पनाओं से
तुम परे इस जहाँ से
मेरे दिन के हसीन ख़्वाबों से
जज़ीरा तुम्हारा तलाश रहा
मिल रहा संकेत हवाओं से
न कोमल न नाज़ुक
न कोई बात कभी मन में रखीं
न बनावटी नाराज़गी
न झूठी कोई सखी
तुम हक़ीक़त तुम ही ख़्वाब
तुम शा'इरी तुम अफ़साना
तुम हो हर्फ़-ए-गुलज़ार
तुम से मिलन एक बार
हक़ीक़त न सही
ये दिन के ख़्वाबों का प्यार
उसी जज़ीरे पर मिलेंगे
जहाँ न होगा कोई अय्यार
न कोई हथियार
वो जहाँ होगा हमारा
वो जज़ीरा होगा हमारा
जब मिलन होगा हमारा
तब अफ़साना ख़त्म होगा तुम्हारा















