"हिचकियाँ"

मुझे जब याद आती है
हाँ उस की याद आती है
तो मैं साँसें रोक लेता हूँ
उसे जी-भर सोच लेता हूँ
मुझे आराम मिलता है
उसे पैग़ाम मिलता है
वो हिचकियाँ ले-लेकर
मुझे सोचेगी अब शब-भर
फिर सोचेगी ये सोचना क्या है
हमारा हिचकियों से मिलना क्या है
फिर उसी की मोहब्बत उसे जवाब देती है
मेरी सोची हुई हिचकी उसे आदाब कहती है
ये कहती है कि अगर सोचा नहीं जाए
नहीं होगी मोहब्बत अगर सोचा नहीं जाए
अगर सोचूँगा नहीं तो ख़ुश कैसे रहूँगा
अगर ऎसे रहूँगा तो मोहब्बत कैसे करूँगा
सुनो, अगर सोचा ही नहीं जाए
तो फिर मोहब्बत ही क्यूँ की जाए

— Shivang Tiwari

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