"सिगरेट की राख"
धुएँ का बादल जो हर पल उठता है
जैसे जीवन की हर साँस जलती है
सुलगती सिगरेट जैसे एक उम्मीद
जो धीरे-धीरे राख बनकर बिख़रती है
हर कश में कुछ खो जाता है
जैसे सपने किसी कोने में दब जाते हैं
हाथों में थमी ये पतली सी चीज़
जैसे ज़िन्दगी की एक छोटी सी ख़्वाहिश
जलते हैं होंठ जलते हैं ख़्वाब
हर धुएँ में दिखता है दिल का अज़ाब
मगर क्या मिला इस आग में
सिर्फ़ राख और कुछ सूनी यादें
सिगरेट बुझती है पर जलना जारी है
जैसे दिल के कोने में कोई दर्द भारी है
मगर कौन समझे इस धुएँ की सच्चाई
जो दिखता है वो सिर्फ़ पल भर की रिहाई
ये सिगरेट बस एक आदत नहीं
जैसे ज़िन्दगी की कोई छुपी हुई बेबसी है
हर सुलगता कश एक चीख सुनाता है
जो शायद किसी ने कभी समझा ही नहीं















