“मोहब्बत”
न कोई फ़साना है न कोई कहानी है मेरी
मैं कोई राजा तो नहीं,पर एक रानी है मेरी
ज़्यादा लंबी नहीं एक मुख़्तसर सी कहानी है मेरी
एक वो हसीना जिस में था रूह कब्ज़ करने का हुनर
उस के क़ब्ज़े में हम आ गए बस यहीं परेशानी है मेरी
फिर उस से आख़िर में हम को इश्क़ हो गया
शायद यही हम से एक जु़र्म हो गया
ये सब करने के बा'द बस एक तजुर्बा हाथ आया
जो कहते हैं मोहब्बत में कुछ नहीं
उन को देने के लिए एक जवाब हाथ आया
भाव बढ़ जाते हैं इज़हार-ए-मोहब्बत से इन के
ये तजुर्बा भी हम को ये काम करने के बा'द आया
किसी दीवार पे लिखा था मोहब्बत जु़र्म है
मैं ने उस को उतारा और फाड़ आया
आख़िर मुझे इस से तजुर्बा जो हाथ आया















