अब फ़िक्र के वजूदस टकरा गया हूँ मैं
करने लगा हूँ शायरी पगला गया हूँ मैं
लगने लगा है मन ये मेरा ज़िन्दगी में क्यूँ
ये कौन सी ख़ता की सज़ा पा गया हूँ मैं
उसके हसीन रुख़ पे उदासी जवान है
यानी मशक़्क़तों से भुलाया गया हूँ मैं
लड़ना पड़ा मुझे दिये सा आफ़ताब से
यानी तमाम ज़ीस्त सताया गया हूँ मैं
मैं ख़ुशनुमा सी रात के सीने का दर्द हूँ
सबकी हँसी के पीछे छुपाया गया हूँ मैं
यूँँ कारवाँ-ए-ज़ीस्त में था साथ हर कोई
फिर भी क़ज़ा के मोड़ से तन्हा गया हूँ मैं
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