मोहब्बत को दिल से उतारा नहीं है
कमी है मगर कुछ ख़सारा नहीं है
हाँ मझधार के बीच फँस हम गए हैं
कि पतवार है पर किनारा नहीं है
अकेला चमकता रहा चाँद ऊपर
कि क्यूँ पास इक भी सितारा नहीं है
जो देखा था हमने हाँ उसकी नज़र में
जहाँ में कहीं वो नज़ारा नहीं है
कि कुर्बां किया जिसपे सब कुछ ही हमने
वही शख़्स क्यूँ अब हमारा नहीं है
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