ज़िन्दगी का इस्तिआरा देखकर के
दुख हुआ था ये नज़ारा देखकर के
'इश्क़ में जब भी नफ़ा नुक़सान जोड़े
चौक उट्ठा मैं ख़सारा देखकर के
ये मुहब्बत का भरम तो टूटना था
एक दिन मेरा तुम्हारा देखकर के
हम वही गलती कहीं फिर से न कर दें
उनकी बाँहों का सहारा देखकर के
वो समंदर को मेरे क्या रोक लेंगे
डर गये थे जो किनारा देखकर के
कर दिया इग्नोर मुझको इक दफ़ा तो
मैंने फेरा मुँह दुबारा देखकर के
मैंने ऊपर की तरफ़ मुट्ठी बढ़ा ली
आसमाँ में इक सितारा देखकर के
फिर किसी इक सीन में टूटा खिलौना
रो पड़ा बच्चा बिचारा देखकर के
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