ज़िन्दगी का इस्तिआरा देख कर के
दुख हुआ था ये नज़ारा देख कर के
इश्क़ में जब भी नफ़ा नुक़सान जोड़े
चौक उट्ठा मैं ख़सारा देख कर के
ये मुहब्बत का भरम तो टूटना था
एक दिन मेरा तुम्हारा देख कर के
हम वही ग़लती कहीं फिर से न कर दें
उन की बाँहों का सहारा देख कर के
वो समुंदर को मेरे क्या रोक लेंगे
डर गए थे जो किनारा देख कर के
कर दिया इग्नोर मुझ को इक दफ़ा तो
मैं ने फेरा मुँह दुबारा देख कर के
मैं ने ऊपर की तरफ़ मुट्ठी बढ़ा ली
आसमाँ में इक सितारा देख कर के
फिर किसी इक सीन में टूटा खिलौना
रो पड़ा बच्चा बिचारा देख कर के
— Sunny Seher















