"ज़िंदगी"

ये रुख़्सती भला रुख़्सती कहाँ है
तुझ से बिछड़ूँगा जानूँगा ज़िंदगी कहाँ है
नशेमन टूट-टूट कर बिख़रा है जैसे
शाम-ए-ग़म मुख़्तसर सी कहाँ है
सब्र करूँ इन्तिज़ार करूँ रोऊँ जान दे दूँ
तुम्हें मेरी बातों पर ए'तिबार कहाँ है
ख़फ़ा तो कर देगा न वो जाँ-नशीं
वो जो इत्मीनान से पूछ रहा दर्द कहाँ है
तेरे बा'द भी जिए जा रहे हैं हम
तुम भी कहते थे कुछ भी मुश्किल कहाँ है
हालातों के बर-अक्स हम फ़क़त तेरे रहे
मेरी बेख़ुदी मेरी बेवसी मेरा असासा कहाँ है
रईसी तुम्हारी के चर्चे हैं हर ज़बान पर
बताओ मेरे हिस्से की तसल्ली दिलासा कहाँ है

— Shivang Tiwari

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