भले जीना पड़े मजबूर हो के
जिऊँगा मैं तेरा सिन्दूर हो के
तुम्हारे ख़्वाब शीशे की तरह हैं
बहुत चुभते हैं चकनाचूर हो के
मैं उसका रस्ता हूँ मंज़िल नहीं हूँ
मुझे भूलेगा वो मशहूर हो के
कहानी बनती उसके पास रह कर
ग़ज़ल बनती है उस सेे दूर हो के
तेरे जाने का ग़म क्या जा सकेगा
भरेगा ज़ख़्म क्या नासूर हो के
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